अल्मोड़ा-अल्मोड़ा में होली का उल्लास अपने पूरे रंग में दिखाई देने लगा है। सांस्कृतिक नगरी में बैठकी होली की परंपरा के साथ पर्व की औपचारिक शुरुआत हो गई है। शहर के विभिन्न हिस्सों में होली के शास्त्रीय गीतों और रागों की गूंज सुनाई देने लगी है, जिससे वातावरण पूरी तरह रंगीन हो उठा है। बैठकी होली के माध्यम से लोग एक-दूसरे से जुड़ते हैं और सामूहिक रूप से इस सांस्कृतिक धरोहर को आगे बढ़ाते हैं।
बैठकी होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि सुर, ताल और परंपरा का संगम है। इसमें युवा और बुजुर्ग एक साथ बैठकर होली के पारंपरिक गीत गाते हैं, जिससे पीढ़ियों के बीच सांस्कृतिक संवाद मजबूत होता है। जैसे-जैसे होली का पर्व नजदीक आता जा रहा है, अल्मोड़ा की गलियों और चौबारों में उत्साह बढ़ता जा रहा है और शहर पूरी तरह होली के रंग में रंगने लगा है।
बैठकी होली का इतिहास
कुमाऊँ अंचल की बैठकी होली का इतिहास कई दशकों पुराना और समृद्ध रहा है। माना जाता है कि इस परंपरा की शुरुआत शास्त्रीय संगीत और भक्ति भाव से जुड़ी हुई थी। पहले समय में यह होली मंदिरों, चौपालों और प्रतिष्ठित परिवारों के घरों में बैठकर गाई जाती थी, जहां लोग रंग खेलने से पहले सुर और शब्दों के माध्यम से होली का स्वागत करते थे।
बैठकी होली में ब्रज और शास्त्रीय परंपरा का गहरा प्रभाव दिखाई देता है। इसमें खड़ी होली की तरह नृत्य नहीं होता, बल्कि सभी लोग एक स्थान पर बैठकर राग-रागिनियों में होली के पद गाते हैं। इन गीतों में भक्ति, प्रेम, सामाजिक संदेश और हास्य का सुंदर मेल देखने को मिलता है।
समय के साथ यह परंपरा अल्मोड़ा से निकलकर नैनीताल, बागेश्वर, हल्द्वानी सहित पूरे कुमाऊँ में फैल गई। आज भी बैठकी होली को सांस्कृतिक विरासत के रूप में संजोया जा रहा है। यह केवल त्योहार नहीं, बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी चलती आ रही एक जीवंत परंपरा है, जो कुमाऊँ की पहचान और सामाजिक एकता का प्रतीक मानी जाती है।
More Stories
अल्मोड़ा में पेट्रोल की कमी की खबरों पर प्रशासन का रुख स्पष्ट, आपूर्ति जल्द होगी सामान्य
अल्मोड़ा में जिलाधिकारी ने कानून-व्यवस्था और राजस्व वसूली कार्यों की समीक्षा की
स्याल्दे बिखौती मेला: अल्मोड़ा की पाली पछाऊं घाटी में लोक संस्कृति का शंखनाद, चार दिनों तक बिखरेगी सांस्कृतिक छटा