अल्मोड़ा जिले की प्रशासनिक व्यवस्थाओं को चुस्त-दुरुस्त करने के उद्देश्य से कुमाऊं कमिश्नर दीपक रावत ने मंगलवार को कलेक्ट्रेट परिसर का विस्तृत निरीक्षण किया। इस दौरान उन्होंने न केवल फाइलों के रखरखाव का जायजा लिया, बल्कि राजस्व न्यायालयों में वर्षों से लंबित पड़े मुकदमों पर नाराजगी जाहिर करते हुए उनके त्वरित निस्तारण के आदेश दिए। कमिश्नर ने स्पष्ट किया कि न्याय में देरी भी एक प्रकार का अन्याय है, इसलिए अधिकारियों को समय सीमा के भीतर वादों को निपटाना होगा। कलेक्ट्रेट पहुंचने पर जिलाधिकारी अंशुल सिंह और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने उनका स्वागत किया, जिसके बाद घंटों तक चली इस जांच प्रक्रिया में रिकॉर्ड रूम से लेकर विभिन्न पटलों की कार्यप्रणाली को बारीकी से परखा गया।
पूरा घटनाक्रम और पृष्ठभूमि
17 फरवरी 2026 की सुबह कुमाऊं कमिश्नर दीपक रावत अल्मोड़ा कलेक्ट्रेट पहुंचे। उनके आगमन के साथ ही प्रशासनिक अधिकारियों में हलचल तेज हो गई। निरीक्षण की शुरुआत कलेक्टर कोर्ट से हुई, जहां उन्होंने राजस्व संबंधी मुकदमों की फाइलों को खोलकर देखा। उन्होंने पाया कि कुछ मामले काफी समय से लंबित हैं, जिस पर उन्होंने अधिकारियों से जवाब-तलब किया।

इसके बाद वे रिकॉर्ड रूम (अभिलेखागार) पहुंचे। यहां दस्तावेजों की स्थिति को देखते हुए उन्होंने ऐतिहासिक और आजादी से पूर्व के अभिलेखों के संरक्षण पर विशेष जोर दिया। कमिश्नर ने निर्देश दिए कि पुराने दस्तावेजों को केवल अलमारियों में बंद न रखा जाए, बल्कि उनका वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण और डिजिटलीकरण किया जाए ताकि भविष्य में ये सुरक्षित रहें और आसानी से खोजे जा सकें। निरीक्षण के दौरान जिलाधिकारी अंशुल सिंह, मुख्य विकास अधिकारी रामजी शरण शर्मा और अपर जिलाधिकारी युक्ता मिश्र भी साथ रहे, जिन्हें कमिश्नर ने व्यवस्थाओं में सुधार के लिए कड़े दिशा-निर्देश जारी किए।
कारण और परिस्थितियाँ
कलेक्ट्रेट के निरीक्षण का मुख्य कारण अक्सर जनता की ओर से आने वाली शिकायतें होती हैं, जिनमें काम में देरी और फाइलों के लंबित रहने का मुद्दा प्रमुख होता है। राजस्व अदालतों में तारीख पर तारीख मिलने से ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले फरियादी परेशान रहते हैं। इसके अलावा, सरकारी रिकॉर्ड रूम में रखे पुराने दस्तावेज अक्सर उचित देखरेख के अभाव में खराब होने लगते हैं। इन्हीं परिस्थितियों को सुधारने और प्रशासनिक पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए कमिश्नर द्वारा यह कदम उठाया गया। दीपक रावत ने पटलों पर जाकर कर्मचारियों से उनके कार्यभार की जानकारी ली और यह समझने की कोशिश की कि देरी के तकनीकी कारण क्या हैं।
जनता / पाठकों पर प्रभाव
कमिश्नर के इस सख्त रुख का सीधा असर अल्मोड़ा की आम जनता पर पड़ेगा। विशेषकर उन लोगों को राहत मिलेगी जिनके भूमि विवाद या अन्य राजस्व मामले कलेक्ट्रेट की अदालतों में अटके हुए हैं। जब उच्च स्तर से सीधे मॉनिटरिंग होती है, तो निचले स्तर के कर्मचारी और अधिकारी कार्य के प्रति अधिक सजग हो जाते हैं। आम जनता में यह संदेश गया है कि उनकी समस्याओं को लेकर प्रशासन गंभीर है और बेवजह की फाइलबाजी अब नहीं चलेगी। इससे सरकारी तंत्र के प्रति लोगों का विश्वास बढ़ता है।
आगे क्या बदलेगा
निरीक्षण के बाद अब कलेक्ट्रेट की कार्यप्रणाली में कई बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे:
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समयबद्ध निस्तारण: अब हर वाद (केस) के निस्तारण के लिए एक निश्चित समय सीमा तय की जाएगी, जिसकी रिपोर्ट सीधे कमिश्नर कार्यालय को भेजी जा सकती है।
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डिजिटल रिकॉर्ड: पुराने और जर्जर हो रहे दस्तावेजों को स्कैन कर डिजिटल रूप में सहेजा जाएगा। इससे भविष्य में खतौनी या पुराने नक्शे निकालने के लिए लोगों को हफ्तों इंतजार नहीं करना पड़ेगा।
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बेहतर प्रबंधन: रिकॉर्ड रूम में बस्तों पर वर्षवार स्टीकर लगाने की प्रक्रिया से फाइलों को खोजने में लगने वाला समय कम होगा।
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जवाबदेही: लापरवाह कर्मचारियों और अधिकारियों पर अब सीधी नजर रहेगी, जिससे कार्य की गुणवत्ता में सुधार आएगा।
आम आदमी को क्या फायदा या असर
एक आम नागरिक के लिए कलेक्ट्रेट वह जगह है जहां उसके जमीन-जायदाद के हक तय होते हैं। कमिश्नर के निर्देशों के बाद:
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दूरी और समय की बचत: गांवों से बार-बार कलेक्ट्रेट के चक्कर काटने वाले बुजुर्गों और किसानों को त्वरित न्याय मिलेगा।
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पारदर्शिता: डिजिटलीकरण के कारण भ्रष्टाचार की गुंजाइश कम होगी और लोग ऑनलाइन अपने दस्तावेजों की स्थिति जान सकेंगे।
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ऐतिहासिक विरासत का संरक्षण: अल्मोड़ा के गौरवशाली इतिहास से जुड़े दस्तावेज जो आजादी से पहले के हैं, वे अब आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रहेंगे।
निष्कर्ष (जनहित के नजरिए से)
कुमाऊं कमिश्नर दीपक रावत का यह दौरा केवल एक औपचारिक निरीक्षण नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र को उसकी जिम्मेदारियों का अहसास कराने की एक प्रक्रिया है। कलेक्ट्रेट जैसे महत्वपूर्ण संस्थान में जब कार्यों की गति तेज होती है, तो उसका सकारात्मक असर पूरे जिले के विकास पर पड़ता है। डिजिटलीकरण और त्वरित न्याय की दिशा में दिए गए ये निर्देश यदि धरातल पर पूरी तरह लागू होते हैं, तो यह सुशासन की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर साबित होगा। अंततः, शासन की सफलता इस बात में निहित है कि अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति को सरकारी दफ्तर से कितनी सुगमता से न्याय और सेवा प्राप्त हो रही है।
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