नई दिल्ली: देश की राजनीति में महिला आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महिला आरक्षण संशोधन विधेयक के पारित न हो पाने पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए इसे विपक्ष की एक बड़ी राजनीतिक भूल करार दिया है। शनिवार को राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने सीधे तौर पर विपक्षी दलों को निशाने पर लेते हुए कहा कि उन्होंने इस महत्वपूर्ण विधेयक का विरोध करके ‘पाप’ किया है, जिसे देश की नारी शक्ति कभी माफ नहीं करेगी। लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत की कमी के कारण यह ऐतिहासिक कदम फिलहाल रुक गया है, जिससे सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है।
पूरा घटनाक्रम और पृष्ठभूमि
महिला आरक्षण का विषय भारतीय राजनीति में दशकों पुराना है। वर्तमान सरकार ने महिलाओं को विधायी निकायों में प्रतिनिधित्व देने के उद्देश्य से एक ‘ईमानदार प्रयास’ के रूप में इस संशोधन विधेयक को सदन के पटल पर रखा था। सरकार का तर्क था कि यह बिल उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम में संतुलित सशक्तिकरण सुनिश्चित करने के लिए समय की मांग है।
सदन की कार्यवाही के दौरान जब वोटिंग हुई, तो विधेयक को पारित कराने के लिए आवश्यक विशेष बहुमत (दो-तिहाई समर्थन) नहीं मिल सका। इसके तुरंत बाद प्रधानमंत्री ने राष्ट्र को संबोधित किया। उन्होंने स्पष्ट रूप से कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और द्रमुक जैसी पार्टियों का नाम लेते हुए आरोप लगाया कि इन ‘परिवारवादी’ पार्टियों ने अपने निजी स्वार्थों के कारण महिलाओं के सपनों की ‘भ्रूणहत्या’ की है। प्रधानमंत्री ने देश की महिलाओं से माफी मांगते हुए कहा कि भले ही आज वह सफल नहीं हो पाए, लेकिन उनका संकल्प अडिग है।
कारण और परिस्थितियाँ
इस बिल के गिरने के पीछे के कारणों को लेकर अब विश्लेषण शुरू हो गया है। सरकार का आरोप है कि विपक्षी दल केवल राजनीति के लिए मेजें थपथपाते रहे, लेकिन जब वास्तव में महिलाओं को अधिकार देने की बात आई, तो उन्होंने पीछे हटकर नारी शक्ति के स्वाभिमान को चोट पहुंचाई।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि विपक्ष के भीतर आरक्षण के अंदर आरक्षण (OBC और कोटा के भीतर कोटा) की मांग को लेकर असहमति थी। वहीं, प्रधानमंत्री ने इसे विपक्ष की ‘स्वार्थी राजनीति’ करार दिया है। उनके अनुसार, ये पार्टियाँ महिलाओं को आगे बढ़ते हुए इसलिए नहीं देखना चाहतीं क्योंकि उन्हें डर है कि जागरूक और सशक्त महिला नेतृत्व उनकी पारंपरिक और परिवारवादी राजनीति को खत्म कर सकता है।
जनता और पाठकों पर प्रभाव
इस घटनाक्रम का सीधा असर देश की आधी आबादी यानी महिला मतदाताओं की सोच पर पड़ने वाला है। एक तरफ जहाँ सरकार खुद को महिलाओं के सबसे बड़े हितैषी के रूप में पेश कर रही है, वहीं विपक्ष पर ‘अधिकार छीनने’ का ठप्पा लगाने की कोशिश की जा रही है। आम जनता के बीच यह संदेश गया है कि महिला सशक्तिकरण जैसे गंभीर विषयों पर भी राजनीतिक सर्वसम्मति बनाना कितना कठिन है। विशेषकर ग्रामीण और मध्यम वर्गीय महिलाओं में इस बात को लेकर चर्चा है कि आखिर क्यों उनके प्रतिनिधित्व के रास्ते में रोड़े अटकाए जा रहे हैं।
आगे क्या बदलेगा?
बिल के गिरने से अब आने वाले चुनावों में महिला आरक्षण एक केंद्रीय चुनावी मुद्दा बनेगा। सत्ता पक्ष इस मुद्दे को लेकर जनता के बीच जाएगा और विपक्ष की ‘महिला विरोधी’ छवि बनाने की कोशिश करेगा। दूसरी ओर, विपक्ष को भी अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी कि उन्होंने विधेयक का विरोध क्यों किया या उनकी शर्तें क्या थीं। आने वाले समय में सरकार फिर से इस विधेयक को सदन में ला सकती है, लेकिन इसके लिए उसे व्यापक राजनीतिक सहमति या फिर भारी जनादेश की आवश्यकता होगी।
आम आदमी को क्या फायदा या असर?
एक आम नागरिक के लिए यह खबर संसदीय लोकतंत्र की कार्यप्रणाली को समझने का अवसर है। महिला आरक्षण लागू होने से देश की नीति-निर्माण प्रक्रिया में बदलाव आता और महिलाओं से जुड़े मुद्दों को संसद में अधिक मजबूती से उठाया जा सकता था। बिल के अटकने से वह सुधार फिलहाल टल गया है जो ज़मीनी स्तर पर बदलाव ला सकता था। हालांकि, इस पर हो रही देशव्यापी चर्चा से महिलाओं में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ी है।
निष्कर्ष (जनहित के नजरिए से)
महिला आरक्षण केवल एक कानूनी बदलाव नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव की नींव है। किसी भी लोकतंत्र की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह अपने समाज के हर वर्ग, विशेषकर महिलाओं को कितनी भागीदारी देता है। राजनीतिक दलों को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर इस मुद्दे पर विचार करना चाहिए। प्रधानमंत्री का यह संबोधन केवल एक भाषण नहीं, बल्कि भविष्य की चुनावी रणनीति और महिला सशक्तिकरण के प्रति उनके संकल्प का प्रतिबिंब है। अब देखना यह होगा कि क्या देश की ‘नारी शक्ति’ आने वाले समय में इन राजनीतिक दलों को अपनी शक्ति का अहसास कराती है।
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