चंपावत के गड़कोट गांव में अवैध खनन पर ग्रामीणों का आक्रोश, निष्पक्ष जांच की मांग
गीता जोशी (संपादक)प्रकाशित: 9 सितंबर 2026 | 08:36 AMअपडेट: 9 सितंबर 2026 | 08:43 AM127

चंपावत, खबर… चंपावत जिले के गड़कोट गांव में लंबे समय से चल रहे खनन को लेकर ग्रामीणों और युवाओं में नाराजगी लगातार बढ़ती जा रही है। चंपावत मुख्यालय से लगभग 24 किलोमीटर दूर स्थित इस गांव में आज भी कई बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। ऐसे में पहाड़ और जंगल से लगातार पत्थर निकाले जाने को लेकर ग्रामीण सवाल उठा रहे हैं।


खनन की शुरुआत और बढ़ता नुकसान
ग्रामीणों के अनुसार, सड़क निर्माण के दौरान शुरू हुआ पत्थर निकालने का काम समय के साथ बढ़ता गया। जिस पहाड़ से लगातार पत्थर निकाले गए, वहां अब बड़े पैमाने पर कटाव दिखाई देता है। ग्रामीणों को आशंका है कि यदि इसी तरह खनन जारी रहा तो भविष्य में यह क्षेत्र सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील हो सकता है।
युवाओं की चिंता और ग्राम प्रधान की प्रतिक्रिया
इसी मामले को लेकर गांव के कुछ युवाओं ने सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से अपनी चिंता जाहिर की। युवाओं का कहना है कि उनकी मांग केवल इतनी थी कि गांव में हो रहे खनन और उससे होने वाले नुकसान की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। उनका उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष को निशाना बनाना नहीं था।
ग्रामीणों के अनुसार, इस पूरे मामले में ग्राम प्रधान की ओर से सोशल मीडिया पर युवाओं के प्रति बेहद आपत्तिजनक और बेबुनियाद टिप्पणियां की गईं, जिससे गांव के कई युवा आहत हुए। युवाओं का कहना है कि उन्होंने प्रधान के खिलाफ व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं की थी और न ही उनके चरित्र पर कोई सवाल उठाया था। वे केवल गांव में हो रहे काम और उससे जुड़े नुकसान की जवाबदेही मांग रहे थे।
जनप्रतिनिधियों के रवैये पर सवाल
ग्रामीणों का सवाल है कि यदि गांव में किसी तरह की अनियमितता है तो उसकी जांच कराने में किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि जब युवा गांव के विकास और प्राकृतिक संसाधनों को लेकर सवाल पूछ रहे हों, तो उनके साथ धमकी भरे या अपमानजनक तरीके से बात करना क्या एक जनप्रतिनिधि को शोभा देता है?
बुनियादी सुविधाओं का अभाव और विकास का सवाल
ग्रामीणों का कहना है कि आज गांव में एक सुरक्षित और बेहतर रास्ते की जरूरत है। कई जगह सुरक्षा दीवारों की आवश्यकता है और अन्य बुनियादी सुविधाओं को लेकर भी ग्रामीण लंबे समय से परेशान हैं। ऐसे में ग्रामीण यह जानना चाहते हैं कि अब तक गांव में हुए विकास कार्यों का वास्तविक असर जमीन पर कितना दिखाई देता है। ग्रामीणों का कहना है कि विकास के नाम पर अगर पहाड़ से संसाधन निकाले जा रहे हैं, तो गांव को उसका क्या लाभ मिल रहा है और इससे होने वाले नुकसान की जिम्मेदारी कौन लेगा?
युवाओं का कहना है कि वे खनन के खिलाफ इसलिए आवाज उठा रहे हैं क्योंकि वे अपने गांव के भविष्य को लेकर चिंतित हैं। उनका किसी नेता या व्यक्ति से व्यक्तिगत विवाद नहीं है।
अधिकारों और सम्मान की मांग
युवाओं और ग्रामीणों का सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब गांव के लोग अपने अधिकारों, विकास और सुरक्षा को लेकर सवाल करें तो जनप्रतिनिधियों का रवैया कैसा होना चाहिए? ग्रामीणों का कहना है कि जनप्रतिनिधि जनता के सवालों का जवाब देने और उनकी समस्याओं को प्रशासन तक पहुंचाने के लिए चुने जाते हैं। यदि सवाल पूछने वाले युवाओं को ही अपमानित किया जाएगा या उन्हें धमकाया जाएगा, तो इससे गांव के लोगों का व्यवस्था पर भरोसा कमजोर होगा।
पलायन के कारणों पर चिंतन
ग्रामीणों का कहना है कि पहाड़ों से पलायन केवल रोजगार की कमी से नहीं होता। जब गांव में बुनियादी सुविधाएं नहीं हों, प्राकृतिक संसाधनों को लेकर पारदर्शिता न हो और ग्रामीणों के सवालों को सम्मान के साथ न सुना जाए, तो आने वाली पीढ़ी गांव में रुकने के बजाय बाहर जाने का रास्ता चुनती है।
प्रशासन से निष्पक्ष जांच की मांग
ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि गड़कोट में हो रहे खनन की निष्पक्ष जांच कराई जाए। मौके पर संबंधित विभागों की टीम भेजकर खनन से हुए नुकसान, सड़क की स्थिति और पहाड़ की सुरक्षा का आकलन किया जाए। साथ ही गांव में हुए विकास कार्यों की भी जांच कर उनकी वास्तविक स्थिति ग्रामीणों के सामने रखी जाए।
ग्रामीणों का कहना है कि यह लड़ाई किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि गांव के अधिकार, प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा, पारदर्शिता और सम्मान के लिए है। उनका कहना है कि सवाल पूछना अपराध नहीं है। अगर गांव के विकास के लिए सवाल पूछने वाले युवा ही गलत हैं, तो फिर गांव के विकास की आवाज कौन उठाएगा?
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