संपादकीय

कारगिल विजय दिवस: जब कैप्टन विक्रम बत्रा ने 'ये दिल मांगे मोर' को शौर्य की पहचान बना दिया

मुख्य संपादकप्रकाशित: 26 जुलाई 2026 | 02:05 PM20

कारगिल विजय दिवस: जब कैप्टन विक्रम बत्रा ने 'ये दिल मांगे मोर' को शौर्य की पहचान बना दिया

26 जुलाई केवल एक तारीख नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास में साहस, बलिदान और राष्ट्रभक्ति का वह अध्याय है, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। 1999 में कारगिल की बर्फीली चोटियों पर लड़ा गया युद्ध केवल सीमाओं की रक्षा का संघर्ष नहीं था, बल्कि यह भारत की सैन्य क्षमता, रणनीतिक दृढ़ता और सैनिकों के अदम्य साहस की परीक्षा भी थी। इस विजय की कहानी अनेक वीरों के बलिदान से लिखी गई, लेकिन कुछ नाम ऐसे हैं जो समय के साथ किंवदंती बन गए। उनमें सबसे प्रमुख नाम है परम वीर चक्र से सम्मानित कैप्टन विक्रम बत्रा

हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में जन्मे कैप्टन विक्रम बत्रा ने कम उम्र में ही भारतीय सेना को अपना जीवन समर्पित कर दिया। जब कारगिल युद्ध छिड़ा, तब वे 13 जम्मू एवं कश्मीर राइफल्स का हिस्सा थे। दुश्मन ने ऊँची पर्वत चोटियों पर कब्जा कर भारत की सामरिक सुरक्षा को चुनौती दी थी। ऐसे कठिन समय में भारतीय सेना ने ‘ऑपरेशन विजय’ शुरू किया और अनेक युवा अधिकारियों ने असंभव प्रतीत होने वाले अभियानों को सफल बनाया।

कैप्टन विक्रम बत्रा के नेतृत्व में पॉइंट 5140 पर किया गया अभियान भारतीय सैन्य इतिहास की सबसे साहसिक कार्रवाइयों में गिना जाता है। दुश्मन की लगातार गोलीबारी, खड़ी चढ़ाई और विषम मौसम के बावजूद उन्होंने अपने साथियों के साथ चोटी पर कब्जा कर लिया। सफलता के बाद रेडियो पर उनके शब्द थे— “ये दिल मांगे मोर।” यह वाक्य उस समय एक सैन्य संदेश था, लेकिन देखते ही देखते पूरे देश के लिए साहस और आत्मविश्वास का प्रतीक बन गया।

इसके बाद उन्हें पॉइंट 4875 पर कब्जा करने का जिम्मा सौंपा गया। यह मिशन पहले से भी अधिक चुनौतीपूर्ण था। युद्ध के दौरान जब उनके एक साथी अधिकारी गंभीर खतरे में थे, तब कैप्टन बत्रा स्वयं उन्हें सुरक्षित निकालने के लिए आगे बढ़े। इसी प्रयास में वे दुश्मन की गोली का निशाना बने और मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। उनका बलिदान इस बात का उदाहरण है कि भारतीय सैनिक के लिए अपने साथियों और राष्ट्र की सुरक्षा स्वयं के जीवन से भी अधिक महत्वपूर्ण होती है।

आज, कारगिल विजय दिवस पर जब देश उन शहीदों को श्रद्धांजलि देता है, तो यह केवल स्मरण का अवसर नहीं होना चाहिए। यह आत्ममंथन का भी समय है कि क्या हम अपने सैनिकों के त्याग के प्रति उतने ही संवेदनशील हैं, जितना युद्ध के दिनों में होते हैं। सीमा पर तैनात जवानों का संघर्ष मौसम, भूगोल और दुश्मन—तीनों से एक साथ होता है। उनके पराक्रम का सम्मान केवल समारोहों से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता, जिम्मेदार नागरिकता और देशहित को सर्वोपरि रखने की भावना से भी होना चाहिए।

कैप्टन विक्रम बत्रा की कहानी नई पीढ़ी के लिए केवल इतिहास नहीं, बल्कि प्रेरणा का स्रोत है। उनका जीवन बताता है कि सच्चा नेतृत्व पद से नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में लिए गए निर्णयों और अपने कर्तव्य के प्रति अटूट निष्ठा से जन्म लेता है। उन्होंने यह साबित किया कि देशभक्ति केवल शब्दों से नहीं, बल्कि कर्म और बलिदान से परिभाषित होती है।

कारगिल विजय दिवस हमें यह याद दिलाता है कि भारत की सीमाएँ केवल हथियारों से नहीं, बल्कि उन अनगिनत सैनिकों के साहस, अनुशासन और सर्वोच्च बलिदान से सुरक्षित हैं। कैप्टन विक्रम बत्रा का नाम आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत रहेगा और उनका अमर संदेश—“ये दिल मांगे मोर”—हर भारतीय के मन में राष्ट्रसेवा की भावना को प्रज्वलित करता रहेगा।

शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा सहित कारगिल युद्ध के सभी अमर वीरों को विनम्र श्रद्धांजलि।
जय हिन्द।

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