मोबाइल टावर नहीं, फिर भी चलेगा फोन? जानिए सैटेलाइट से कॉल और इंटरनेट मिलने की पूरी तकनीक
गीता जोशी (संपादक)23 जुलाई 2026 | 11:34 PM11

डायरेक्ट-टू-डिवाइस तकनीक मोबाइल फोन को सीधे उपग्रह से जोड़ने के लिए विकसित की जा रही है। यह पहाड़ी और दूरदराज क्षेत्रों में उपयोगी हो सकती है, लेकिन फिलहाल इसे सामान्य 4जी या 5जी नेटवर्क का पूर्ण विकल्प नहीं माना जा सकता।
तकनीक डेस्क | 23 जुलाई 2026
मोबाइल फोन से कॉल करने, संदेश भेजने और इंटरनेट चलाने के लिए आमतौर पर आसपास किसी मोबाइल टावर का होना जरूरी होता है। फोन रेडियो सिग्नल के माध्यम से नजदीकी टावर से जुड़ता है और इसके बाद टेलीकॉम कंपनी का नेटवर्क कॉल या इंटरनेट डेटा को आगे पहुंचाता है। पहाड़ी क्षेत्रों, जंगलों, समुद्री इलाकों और दूरदराज के गांवों में मोबाइल टावर उपलब्ध न होने पर फोन में नेटवर्क नहीं आता।
इस समस्या से निपटने के लिए डायरेक्ट-टू-डिवाइस सैटेलाइट कनेक्टिविटी पर काम किया जा रहा है। इस तकनीक में समर्थित मोबाइल फोन कुछ परिस्थितियों में सीधे अंतरिक्ष में मौजूद उपग्रह से संपर्क कर सकता है। इसे डायरेक्ट-टू-डिवाइस यानी डी2डी और नॉन-टेरेस्ट्रियल नेटवर्क यानी एनटीएन के नाम से जाना जाता है। मोबाइल संचार मानक तैयार करने वाली संस्था 3GPP ने नॉन-टेरेस्ट्रियल नेटवर्क की तकनीकी जानकारी में बताया है कि ऐसे नेटवर्क में उपग्रह या हवा में मौजूद प्लेटफॉर्म के माध्यम से संचार सेवा उपलब्ध कराई जा सकती है।
मोबाइल फोन सीधे सैटेलाइट से कैसे जुड़ेगा?
सामान्य नेटवर्क में फोन का सिग्नल जमीन पर लगे मोबाइल टावर तक पहुंचता है। सैटेलाइट आधारित व्यवस्था में फोन का रेडियो सिग्नल अंतरिक्ष में मौजूद उपग्रह तक भेजा जाता है। उपग्रह इसे किसी ग्राउंड स्टेशन, संबंधित मोबाइल नेटवर्क या दूसरे संचार केंद्र तक पहुंचा सकता है। इसके बाद संदेश या डेटा निर्धारित व्यक्ति और सेवा तक भेजा जाता है।
इसे आसान भाषा में अंतरिक्ष में मौजूद मोबाइल टावर जैसा समझा जा सकता है, लेकिन जमीन पर लगे टावर और उपग्रह की क्षमता, दूरी तथा काम करने का तरीका एक जैसा नहीं होता। उपग्रह को बहुत बड़े क्षेत्र में मौजूद कई उपकरणों को संभालना पड़ सकता है। फोन से निकलने वाला सिग्नल भी सीमित शक्ति वाला होता है। इसलिए स्पष्ट आसमान, समर्थित फ्रीक्वेंसी, उचित एंटीना और संबंधित नेटवर्क की अनुमति जरूरी हो सकती है।
3GPP Release 17 में नॉन-टेरेस्ट्रियल नेटवर्क के माध्यम से 5जी और इंटरनेट ऑफ थिंग्स उपकरणों के लिए सैटेलाइट कनेक्टिविटी से जुड़े मानकों को शामिल किया गया। तकनीकी मानकों का उद्देश्य फोन, नेटवर्क उपकरण, चिप निर्माता, मोबाइल ऑपरेटर और सैटेलाइट प्रणाली के बीच अनुकूलता विकसित करना है।
क्या पुराने मोबाइल फोन भी सैटेलाइट से जुड़ जाएंगे?
डायरेक्ट-टू-डिवाइस तकनीक का उद्देश्य सामान्य आकार वाले मोबाइल फोन तक सैटेलाइट कनेक्टिविटी पहुंचाना है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक पुराना मोबाइल फोन स्वतः उपग्रह से जुड़ जाएगा। फोन में उपयुक्त मॉडेम, एंटीना, ऑपरेटिंग सिस्टम और आवश्यक रेडियो फ्रीक्वेंसी का समर्थन होना जरूरी हो सकता है।
इसके अतिरिक्त मोबाइल ऑपरेटर, सिम कार्ड, सैटेलाइट कंपनी और स्थानीय नियमों का अनुकूल होना भी आवश्यक है। कुछ प्रणालियां विशेष सैटेलाइट फ्रीक्वेंसी का उपयोग करती हैं, जबकि कुछ सेवाओं में मोबाइल कंपनियों को आवंटित स्पेक्ट्रम के माध्यम से फोन तक सिग्नल पहुंचाने की व्यवस्था पर काम हो रहा है। इसलिए सुविधा की उपलब्धता केवल फोन के मॉडल से तय नहीं होगी।
शुरुआत में कौन-कौन सी सेवाएं चल सकती हैं?
सैटेलाइट के माध्यम से फोन पर मिलने वाली शुरुआती सुविधाएं सीमित डेटा वाले कामों के लिए अधिक उपयुक्त मानी जाती हैं। इनमें आपातकालीन संदेश भेजना, छोटा टेक्स्ट संदेश, लोकेशन साझा करना और सहायता मांगना शामिल हो सकता है।
इसका एक व्यावहारिक उदाहरण एपल की आपातकालीन सैटेलाइट सुविधा है। कंपनी के अनुसार समर्थित आईफोन मॉडल उन चुनिंदा देशों में सैटेलाइट के माध्यम से आपातकालीन संदेश भेज सकते हैं, जहां यह सेवा आधिकारिक रूप से उपलब्ध है और मोबाइल तथा वाई-फाई नेटवर्क मौजूद नहीं है। एपल की वेबसाइट पर Emergency SOS via Satellite की आवश्यकताएं और उपलब्ध देश देखे जा सकते हैं। भारत वर्तमान उपलब्ध देशों की इस सूची में शामिल नहीं दिखाया गया है, इसलिए इसे भारत में उपलब्ध सुविधा नहीं मानना चाहिए।
एपल के निर्देशों के अनुसार उपग्रह से जुड़ने के लिए खुले स्थान और आसमान की स्पष्ट दृश्यता की आवश्यकता पड़ सकती है। ऊंची इमारतें, पहाड़, घने पेड़ और दूसरी रुकावटें कनेक्शन को प्रभावित कर सकती हैं। सामान्य मोबाइल संदेश की तुलना में सैटेलाइट संदेश भेजने में अधिक समय भी लग सकता है।
क्या सैटेलाइट से वीडियो और सामान्य इंटरनेट भी चलेगा?
सैटेलाइट के माध्यम से इंटरनेट डेटा भेजा जा सकता है, लेकिन मोबाइल फोन पर सीधे मिलने वाली शुरुआती सैटेलाइट सेवा को सामान्य 4जी, 5जी या फाइबर इंटरनेट के बराबर नहीं समझना चाहिए। उपलब्ध बैंडविड्थ कम हो सकती है और प्रतिक्रिया में अधिक समय लग सकता है।
गूगल ने एंड्रॉयड ऐप डेवलपरों के लिए जारी Constrained Satellite Networks मार्गदर्शिका में बताया है कि वर्तमान सैटेलाइट नेटवर्क पर डेटा सीमित संसाधन हो सकता है। कम डेटा वाला टेक्स्ट संदेश अपेक्षाकृत उपयुक्त हो सकता है, जबकि बिना संपीड़न वाला एचडी वीडियो अपलोड करने जैसी गतिविधियों में बफरिंग या विफलता की आशंका हो सकती है।
इस कारण सैटेलाइट से जुड़ने वाले ऐप को बड़ी फाइल, स्वचालित डाउनलोड और अधिक डेटा वाले काम सीमित करने पड़ सकते हैं। आगे तकनीक और नेटवर्क क्षमता में बदलाव हो सकता है, लेकिन किसी परीक्षण या तकनीकी प्रदर्शन को हर स्थान पर व्यावसायिक सेवा उपलब्ध होने की पुष्टि नहीं माना जा सकता।
पहाड़ी और दूरदराज क्षेत्रों में क्या उपयोग हो सकता है?
उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, पूर्वोत्तर भारत और दूसरे पर्वतीय क्षेत्रों में कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण कई स्थानों तक मोबाइल नेटवर्क पहुंचाना चुनौतीपूर्ण होता है। ऊंचे पहाड़, गहरी घाटियां, घने जंगल और कम आबादी वाले क्षेत्र मोबाइल टावर लगाने तथा उन्हें बिजली और फाइबर से जोड़ने में कठिनाई पैदा कर सकते हैं।
ऐसे क्षेत्रों में सैटेलाइट आधारित सीमित संचार व्यवस्था अतिरिक्त माध्यम के रूप में उपयोगी हो सकती है। यात्री, पर्वतारोही, आपदा राहत दल या दूरदराज क्षेत्र में मौजूद व्यक्ति समर्थित सेवा के माध्यम से लोकेशन अथवा छोटा सहायता संदेश भेजने में सक्षम हो सकता है।
हालांकि पहाड़ी क्षेत्र में आसमान का स्पष्ट दिखाई देना हमेशा संभव नहीं होता। संकरी घाटी, चट्टान, घना जंगल और मौसम संबंधी परिस्थितियां उपग्रह सिग्नल को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए यह तकनीक भी प्रत्येक स्थान और प्रत्येक परिस्थिति में काम करेगी, ऐसा निश्चित दावा नहीं किया जा सकता।
मोबाइल टावरों की जगह नहीं लेगा सैटेलाइट नेटवर्क
डायरेक्ट-टू-डिवाइस सैटेलाइट तकनीक का प्रमुख उद्देश्य जमीन आधारित मोबाइल नेटवर्क को हटाना नहीं, बल्कि उसकी कवरेज को अतिरिक्त सहायता देना है। शहरों और घनी आबादी वाले क्षेत्रों में मोबाइल टावर कम दूरी पर बड़ी संख्या में लोगों को तेज सेवा उपलब्ध करा सकते हैं। एक सैटेलाइट को इससे कहीं बड़े क्षेत्र और कई उपयोगकर्ताओं के बीच अपनी क्षमता बांटनी पड़ सकती है।
GSMA की डायरेक्ट-टू-डिवाइस नीति संबंधी जानकारी के अनुसार सैटेलाइट कनेक्टिविटी स्थलीय मोबाइल नेटवर्क की पूरक व्यवस्था बन सकती है। इसका उपयोग कम आबादी वाले, दुर्गम और मोबाइल कवरेज से बाहर के क्षेत्रों तक सीमित संचार पहुंचाने के लिए किया जा सकता है।
भारत में सेवा के लिए नियम और अनुमति जरूरी
भारत में डायरेक्ट-टू-डिवाइस सेवा शुरू करने के लिए केवल उपग्रह और फोन का उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं होगा। स्पेक्ट्रम आवंटन, टेलीकॉम लाइसेंस, सुरक्षा नियम, नेटवर्क इंटरफेस, ग्राउंड स्टेशन और संबंधित सरकारी अनुमतियां भी जरूरी होंगी।
दूरसंचार विभाग के टेलीकम्युनिकेशन इंजीनियरिंग सेंटर ने अप्रैल 2026 में डी2डी और नॉन-टेरेस्ट्रियल नेटवर्क से संबंधित तकनीकी तथा नियामकीय विषयों पर चर्चा आयोजित की थी। विभाग की आधिकारिक जानकारी में कहा गया कि इस तकनीक की संभावनाओं, संचालन संबंधी आवश्यकताओं और भारत में जरूरी नियामकीय ढांचे पर विचार किया गया। इसे किसी निश्चित व्यावसायिक लॉन्च की घोषणा नहीं माना जाना चाहिए।
भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण ने भी सैटेलाइट संचार नेटवर्क के प्राधिकरण और स्पेक्ट्रम व्यवस्था से संबंधित परामर्श पत्र जारी किया था। परामर्श प्रक्रिया का अर्थ है कि नियमों और व्यवस्था पर हितधारकों से सुझाव लिए जा रहे हैं। इससे पूरे भारत में सामान्य फोन पर सैटेलाइट इंटरनेट शुरू होने की पुष्टि नहीं होती।
उपभोक्ताओं को किन बातों की जांच करनी होगी?
किसी भी सैटेलाइट सुविधा का उपयोग करने से पहले यह देखना जरूरी होगा कि फोन का मॉडल, ऑपरेटिंग सिस्टम, सिम कार्ड और टेलीकॉम ऑपरेटर संबंधित सेवा का समर्थन करते हैं या नहीं। साथ ही यह भी जांचना होगा कि वह सुविधा भारत में अधिकृत है या नहीं, किस क्षेत्र में काम करती है और उसके माध्यम से केवल संदेश भेजे जा सकते हैं या कॉल तथा डेटा भी उपलब्ध है।
मोबाइल नेटवर्क के बिना सैटेलाइट से फोन जोड़ने की तकनीक संचार व्यवस्था का नया माध्यम बन रही है। इसका सबसे उपयोगी पक्ष उन इलाकों में सीमित संपर्क उपलब्ध कराना हो सकता है, जहां मोबाइल टावर नहीं पहुंचते। फिलहाल इसे सामान्य मोबाइल इंटरनेट का पूर्ण विकल्प या प्रत्येक फोन पर उपलब्ध सुविधा नहीं माना जा सकता। इसकी वास्तविक उपयोगिता फोन के हार्डवेयर, सैटेलाइट कवरेज, मोबाइल ऑपरेटर, नेटवर्क क्षमता और सरकारी अनुमति पर निर्भर करेगी।
आधिकारिक स्रोत:
